मनरेगा को कमजोर करने की साजिशलोकसभा में बीबीजी राम जी बिल 2025 का किया पुरजोर विरोध नई दिल्ली।
लोकसभा में बीबीजी राम जी बिल 2025 का किया पुरजोर विरोध नई दिल्ली।
लोकसभा में बीबीजी राम जी बिल 2025 का किया पुरजोर विरोध नई दिल्ली।

मनरेगा को कमजोर करने की साजिश बताते हुए बाबू सिंह कुशवाहा ने नए रोजगार बिल को गरीब, मजदूर और ग्रामीण भारत के खिलाफ बताया।

जौनपुर से सांसद बाबू सिंह कुशवाहा ने लोकसभा में बीबी जी राम जी बिल 2025 (विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन) का कड़ा विरोध करते हुए इसे मनरेगा को पिछले दरवाजे से खत्म करने की साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत की जो तस्वीर सरकार दिखा रही है, उसमें गरीब, किसान और मजदूर पूरी तरह गायब हैं।
सांसद कुशवाहा ने कहा कि मनरेगा कोई सामान्य योजना नहीं, बल्कि काम मांगने पर काम पाने का कानूनी अधिकार था, जो महात्मा गांधी के ग्रामीण स्वावलंबन के विचार पर आधारित था।

मनरेगा ने ग्रामीण भारत में बेरोजगारी और पलायन को रोकने में अहम भूमिका निभाई है। इस योजना के तहत हर ग्रामीण परिवार को 100 दिन का रोजगार देने की कानूनी गारंटी है। महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और छोटे किसानों को इस योजना से सबसे अधिक लाभ मिला है।बाबू सिंह कुशवाहा ने कहा कि अगर मनरेगा कमजोर होती है तो सबसे ज्यादा असर इन्हीं वर्गों पर पड़ेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि मनरेगा को कमजोर करने की साजिश के परिणामस्वरूप ग्रामीण गरीबी और असमानता और बढ़ेगी।

सरकार अब नाम बदलकर 125 दिन रोजगार देने की बात कर रही है, जबकि आज तक मजदूरों को औसतन सिर्फ 50 से 55 दिन ही काम मिल पाया है। ऐसे में 125 दिन का वादा सिर्फ कागजी और दिखावटी है। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा 90:10 के स्थान पर 60:40 फंडिंग फार्मूला लागू किए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे बिहार, झारखंड, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्यों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। यह कदम संघीय ढांचे की भावना के खिलाफ है।
बाबू सिंह कुशवाहा ने कहा कि मनरेगा ने महिलाओं, दलितों और आदिवासियों को सम्मान और आत्मनिर्भरता दी। लेकिन नई व्यवस्था में ग्राम सभा, सामाजिक ऑडिट और विकेंद्रीकरण की जगह सब कुछ नौकरशाही और डिजिटल सिस्टम के हवाले किया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि जहां नेटवर्क नहीं है, वहां मजदूर काम तो करेगा लेकिन सर्वर में उसका नाम गायब हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि मनरेगा से तालाब, सड़क, जल संरक्षण और हरियाली जैसी स्थायी संपत्तियां बनीं, जबकि नई योजना में पर्यावरण और टिकाऊ विकास का कोई स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं है।
मजदूरी पर सरकार को घेरते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में ₹234 की मजदूरी में साल भर में सिर्फ ₹5,200 प्रतिमाह की आय बनती है, जो महंगाई के दौर में नाकाफी है। उन्होंने सरकार से मांग की कि यदि 125 दिन का रोजगार देना है तो मजदूरी ₹500 प्रतिदिन की जाए और पूरे 125 दिन का काम सुनिश्चित किया जाए।
अंत में उन्होंने कहा कि नाम बदलने से न रोजगार बढ़ता है और न भूख मिटती है, यह केवल राजनीतिक दिखावा है। इस बिल के जरिए मनरेगा को खत्म करने के किसी भी प्रयास का वे और उनकी पार्टी पुरजोर विरोध करते रहेंगे।

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